भारतीय राजनीति में छोटे और क्षेत्रीय दलों के सामने खड़ा वर्तमान संकट केवल चुनावी हार-जीत का प्रश्न नहीं है। यह संगठनात्मक अनुशासन, वैचारिक निष्ठा, नेतृत्व की विश्वसनीयता और लोकतांत्रिक नैतिकता की सामूहिक परीक्षा है। जब किसी दल के सांसद और विधायक बड़ी संख्या में दिशा बदलने लगते हैं, तब यह समझना आवश्यक हो जाता है कि समस्या केवल बाहरी दबाव की नहीं, बल्कि भीतर की संरचना, टिकट वितरण, राजनीतिक प्रशिक्षण और सत्ता के प्रति अत्यधिक आकर्षण की भी है।
छोटे दलों की शामत आयी क्यों? यह प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले वर्षों में कई क्षेत्रीय दलों ने अपने-अपने राज्यों में अत्यधिक प्रभाव अर्जित किया, परंतु सत्ता के कमज़ोर पड़ते ही उनके भीतर असंतोष, अवसरवाद और नेतृत्व-संघर्ष खुलकर सामने आने लगे। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस के सामने उत्पन्न संकट, महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे गुट की लगातार चुनौती, उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी को लेकर उठती आशंकाएं, दिल्ली और पंजाब की राजनीति में आम आदमी पार्टी से जुड़े दल-बदल, तमिलनाडु में द्रमुक की बदलती रणनीतिक चिंताएं और झारखण्ड में राज्यसभा चुनावों के समय विधायकों की निष्ठा पर उठे प्रश्न, इन सबने भारतीय राजनीति के एक व्यापक रोग को उजागर किया है।
ममता बनर्जी की राजनीति लंबे समय तक क्षेत्रीय शक्ति, सड़क-आधारित आंदोलन और प्रशासनिक आक्रामकता का प्रतीक रही। पश्चिम बंगाल में सत्ता खोने के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर नेतृत्व और चुनाव चिन्ह को लेकर उठते विवाद यह संकेत देते हैं कि दल की शक्ति केवल एक बड़े नेता की लोकप्रियता पर टिके रहने से स्थायी नहीं होती। जब संगठन संस्थागत न होकर व्यक्तिनिष्ठ हो जाता है, तब सत्ता परिवर्तन के बाद वही संगठन जल्दी टूटने लगता है। किसी भी लोकतंत्र में दल का चुनाव चिन्ह, संगठनात्मक संविधान और विधायकों की निष्ठा केवल कानूनी प्रश्न नहीं होते; वे जनादेश और सार्वजनिक विश्वास से जुड़े नैतिक प्रश्न भी होते हैं।
महाराष्ट्र का उदाहरण भी इसी प्रवृत्ति को स्पष्ट करता है। उद्धव ठाकरे की शिवसेना पहले ही बड़े विभाजन से गुजर चुकी थी, और एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में वास्तविक शक्ति-संतुलन बदल गया। बाद की रिपोर्टों में शिवसेना उद्धव गुट के छह सांसदों के बागी होने और शिंदे गुट की ओर झुकने की चर्चा ने यह दिखाया कि विभाजन केवल एक घटना नहीं था, बल्कि एक लंबी राजनीतिक प्रक्रिया थी। उद्धव ठाकरे का यह कहना कि गलत लोगों को टिकट दिया गया, भारतीय राजनीति के एक गहरे सत्य को सामने लाता है: उम्मीदवार चयन में निष्ठा, जनसेवा, वैचारिक स्पष्टता और चरित्र की उपेक्षा अंततः दल को ही महंगी पड़ती है।
उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी को लेकर समय-समय पर यह आशंका व्यक्त की जाती रही है कि उसके सांसदों या विधायकों का एक वर्ग सत्ता पक्ष की ओर जा सकता है। ऐसी आशंकाएं वास्तविक हों या अतिरंजित, वे यह अवश्य दिखाती हैं कि छोटे और मध्यम आकार के दलों में वैचारिक अनुशासन की कमी गंभीर चुनौती बन चुकी है। यदि किसी दल का अस्तित्व केवल जातीय समीकरण, परिवार-आधारित नेतृत्व या अस्थायी गठबंधन पर निर्भर हो, तो सत्ता से दूरी बढ़ते ही उसके प्रतिनिधियों के लिए दल बदलना अपेक्षाकृत आसान हो जाता है।
अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी के संदर्भ में भी यह प्रश्न उठता है कि आंदोलन-आधारित राजनीति सत्ता में आने के बाद किस प्रकार संगठनात्मक कसौटी पर खरी उतरती है। किसी नए दल में तेज़ी से उभरने वाले चेहरों को यदि वैचारिक साधना, सार्वजनिक सेवा और संगठनात्मक तपस्या के बिना उच्च पद मिलते हैं, तो उनकी निष्ठा अक्सर दल की मूल प्रतिज्ञा से अधिक व्यक्तिगत भविष्य पर केंद्रित हो जाती है। राघव चड्ढा जैसे उदाहरणों पर राजनीतिक बहस चाहे जिस दिशा में हो, यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि युवा चेहरों को अवसर देना और उन्हें दीर्घकालिक वैचारिक प्रशिक्षण देना, दोनों अलग-अलग बातें हैं।
द्रमुक और बीजेपी के बीच बढ़ती संभावित रणनीतिक नजदीकियों की चर्चा भी दक्षिण भारत की राजनीति के बदलते स्वरूप की ओर संकेत करती है। तमिलनाडु में जोसेफ विजय के राजनीतिक प्रवेश ने द्रमुक नेतृत्व के सामने नई चुनौती खड़ी की है। क्षेत्रीय दलों के लिए यह समय केवल विरोध की राजनीति का नहीं, बल्कि पुनर्मूल्यांकन का है। यदि क्षेत्रीय दल अपने सामाजिक आधार से बाहर निकलकर व्यापक राष्ट्रीय दृष्टि विकसित नहीं करते, तो वे नई पीढ़ी, नए नेतृत्व और राष्ट्रीय दलों की चुनावी मशीनरी के सामने असुरक्षित हो जाते हैं।
झारखण्ड में राज्यसभा चुनावों के दौरान क्रॉस-वोटिंग और सत्ता-समीकरणों की चर्चा ने यह प्रश्न फिर उठाया कि क्या विधायक वास्तव में दल, विचार और मतदाता के प्रति उत्तरदायी हैं या वे केवल तत्कालीन लाभ के आधार पर निर्णय लेते हैं। राज्यसभा चुनावों में छोटे दलों और गठबंधनों की वास्तविक शक्ति अक्सर उजागर हो जाती है, क्योंकि वहां बंद कमरे की रणनीति, व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और सत्ता से निकटता की चाह खुलकर दिखाई देती है। यह लोकतंत्र के लिए अस्वस्थ संकेत है, चाहे लाभ किसी भी दल को मिले।
इस पूरे परिदृश्य को केवल बीजेपी या नरेंद्र मोदी की शक्ति से समझना अधूरा होगा। यह सत्य है कि राष्ट्रीय स्तर पर सत्ता में बैठा दल प्रशासनिक, संसदीय और राजनीतिक प्रभाव रखता है। यह भी सत्य है कि विपक्षी दल प्रायः केंद्रीय एजेंसियों, धनबल और संस्थागत दबावों के दुरुपयोग का आरोप लगाते हैं। परंतु किसी भी गंभीर विश्लेषण में यह भी देखना होगा कि यदि छोटे दलों की आंतरिक संरचना स्वस्थ, पारदर्शी और वैचारिक होती, तो बाहरी दबाव या प्रलोभन इतनी आसानी से सफल नहीं होते। बाहरी शक्ति तभी प्रभावी होती है जब भीतर की दीवारें पहले से कमजोर हों।
भारतीय राजनीति में दल-बदल की समस्या नई नहीं है। 1960 और 1970 के दशक से ही विधायक और सांसद सत्ता-समीकरणों के अनुसार पाला बदलते रहे हैं। इसी कारण दलबदल विरोधी कानून की आवश्यकता पड़ी। परंतु इस कानून ने समस्या को पूरी तरह समाप्त नहीं किया, क्योंकि दल-बदल अब व्यक्तिगत स्तर के बजाय समूहगत और तकनीकी रूप से सुरक्षित रूपों में होने लगा है। दो-तिहाई समर्थन, स्पीकर की व्याख्या, चुनाव आयोग के निर्णय और अदालतों की प्रक्रिया, ये सब मिलकर राजनीतिक नैतिकता को कानूनी जटिलता में बदल देते हैं। परिणाम यह होता है कि मतदाता की मूल इच्छा पीछे छूट जाती है।
राजनीतिक पतन का सबसे बड़ा कारण उम्मीदवार चयन की अपारदर्शी प्रक्रिया है। जब टिकट सेवा, तपस्या, संगठनात्मक कार्य और विचारधारा के आधार पर न देकर धन, जातीय गणित, बाहुबल, व्यक्तिगत संपर्क या चुनाव जीतने की क्षमता के आधार पर दिए जाते हैं, तो दल अपने भीतर भविष्य के संकट को स्वयं बो देता है। बोया पेड़ बबूल का तो आम कहा से होय? यह कहावत राजनीति में सबसे अधिक सत्य सिद्ध होती है। यदि उम्मीदवार दल को निवेश का मंच समझता है, तो वह चुनाव जीतने के बाद लाभ का अधिकतम अवसर खोजेगा। विपक्ष में बैठना उसे घाटे का सौदा लगेगा, और सत्ता पक्ष उसकी स्वाभाविक पसंद बन जाएगा।
मायावती, प्रशांत किशोर या अन्य नेताओं से संबंधित मुलाकातों और टिकटों को लेकर समय-समय पर अनेक आरोप सार्वजनिक चर्चा में आते रहे हैं। ऐसे आरोपों की सत्यता का निर्णय प्रमाण और जांच से ही होना चाहिए, परंतु यह निर्विवाद है कि टिकट वितरण को लेकर जनमानस में गहरी शंका है। आम मतदाता जब यह सुनता है कि किसी सीट पर टिकट धन या प्रभाव से मिला है, तो लोकतंत्र के प्रति उसका विश्वास कम होता है। वह अनुभव करता है कि उसके श्रम, विश्वास और मत का उपयोग केवल नेताओं और प्रत्याशियों की निजी महत्वाकांक्षा के लिए हो रहा है। यही भाव लोकतांत्रिक निराशा को जन्म देता है।
छोटे दलों में तीन प्रमुख प्रवृत्तियां दिखाई देती हैं: वंशवादी, जातिवादी और क्षेत्रवादी राजनीति। समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, बहुजन समाज पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, द्रमुक, अकाली दल और अन्य दल अलग-अलग ऐतिहासिक कारणों से उभरे, परंतु इनमें से कई दल समय के साथ एक केंद्रीय नेतृत्व, परिवार या सीमित सामाजिक आधार पर निर्भर हो गए। वंशवाद संगठन को स्थिरता का भ्रम देता है, परंतु वह भीतर से प्रतिस्पर्धा, विचार-विमर्श और नेतृत्व-निर्माण को कमजोर कर देता है। जब दल का प्रमुख बनने की योग्यता केवल परिवार, जातीय पहचान या निजी निकटता से तय होती है, तब समर्पित कार्यकर्ता धीरे-धीरे किनारे हो जाते हैं।
वन मेन शो जैसी राजनीतिक संस्कृति में असहमति को विद्रोह माना जाता है। यह प्रवृत्ति केवल छोटे दलों तक सीमित नहीं, परंतु छोटे दलों में इसका प्रभाव अधिक तीखा होता है। बड़े दलों में भी नेतृत्व-केंद्रित राजनीति है, परंतु उनके पास संगठनात्मक स्तर, वैचारिक मंच, संसदीय प्रशिक्षण और व्यापक कैडर-ढांचा अपेक्षाकृत अधिक होता है। छोटे दल यदि इन्हीं संस्थागत साधनों का विकास नहीं करते, तो वे किसी एक नेता की लोकप्रियता के साथ उठते हैं और उसी नेता की कमजोरी के साथ बिखरने लगते हैं।
बीजेपी की वर्तमान स्वीकार्यता और चुनावी मशीनरी छोटे दलों के प्रतिनिधियों को आकर्षित करती है। मोदी है तो जीत की गारंटी है, यह राजनीतिक नारा अपने समर्थकों के बीच केवल प्रचार-वाक्य नहीं, बल्कि चुनावी विश्वास का मनोवैज्ञानिक आधार बन चुका है। सत्ता, संसाधन, संगठन और राष्ट्रीय नेतृत्व की छवि मिलकर उस आकर्षण को बढ़ाती है। परंतु यह भी ध्यान रखना चाहिए कि दूसरे दलों से आए प्रतिनिधि हमेशा वैचारिक रूप से परिवर्तित होकर नहीं आते। अनेक बार वे केवल सत्ता-समीकरण देखकर आते हैं। यही बिंदु बीजेपी के लिए भी चेतावनी है।
जो व्यक्ति विचार से नहीं, अवसर से जुड़ता है, वह अवसर बदलते ही फिर दिशा बदल सकता है। यशवंत सिन्हा और सतपाल मलिक जैसे प्रसंगों को इसी दृष्टि से देखा जाता है। किसी दल में आए बड़े नेता को सम्मान देना एक बात है, परंतु बिना दीर्घकालिक वैचारिक परीक्षण के उसे निर्णायक शक्ति देना दूसरी बात है। यदि कोई नेता सत्ता, पद या व्यक्तिगत प्रतिष्ठा से असंतुष्ट होकर अपने ही दल के विरुद्ध खड़ा हो जाता है, तो यह केवल व्यक्ति की समस्या नहीं रहती; यह उस दल की राजनीतिक चयन-प्रक्रिया पर भी प्रश्न बन जाती है।
बीजेपी, कांग्रेस और अन्य सभी दलों के लिए यह समान पाठ है कि राजनीतिक विस्तार और नैतिक विस्तार में अंतर होता है। संख्या बढ़ाना उपयोगी हो सकता है, परंतु चरित्रहीन विस्तार संगठन को भीतर से खोखला कर सकता है। यदि किसी दल में चोर, गुंडे, ठेकेदार, धनपशु, अवसरवादी और केवल पद-लोलुप तत्व प्रवेश करते हैं, तो वे चुनावी क्षण में उपयोगी दिख सकते हैं, परंतु संकट के समय सबसे पहले वही दल को छोड़ते हैं। राजनीति में संगठन की वास्तविक शक्ति उन लोगों से बनती है जो सिद्धांत, सेवा और समाज के प्रति उत्तरदायी हों।
धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भारत की राजनीतिक परंपरा केवल सत्ता प्राप्ति की परंपरा नहीं रही। राजधर्म, लोकसंग्रह, सेवा, संयम और उत्तरदायित्व जैसे विचार भारतीय सभ्यता में गहराई से जुड़े हैं। हिंदू, बौद्ध, जैन और सिख परंपराओं में नेतृत्व का आदर्श शक्ति से अधिक आत्मसंयम, करुणा, सत्य और धर्मनिष्ठा से निर्मित होता है। इसलिए भारतीय राजनीति का नैतिक प्रश्न केवल संवैधानिक नहीं, सभ्यतागत भी है। जब सार्वजनिक जीवन में शुचिता घटती है, तो समाज के भीतर अविश्वास बढ़ता है और धर्माधारित नैतिकता की जगह शुद्ध सत्ता-गणित ले लेता है।
छोटे दलों की राष्ट्रीय भूमिका का प्रश्न भी गंभीर है। खंडित जनादेश में वे निर्णायक बन जाते हैं, परंतु स्पष्ट बहुमत के युग में उनकी सौदेबाजी शक्ति घट जाती है। यदि वे केवल अपने क्षेत्र, जाति, परिवार या सीमित सामाजिक समूह तक सीमित रहते हैं, तो वे राष्ट्रीय विमर्श में परजीवी समझे जाने लगते हैं। इसके विपरीत यदि वे सुशासन, सांस्कृतिक संरक्षण, आर्थिक विकास, सामाजिक समरसता, राष्ट्रीय सुरक्षा और संघीय संतुलन पर स्पष्ट नीति दें, तो उनकी भूमिका सम्मानजनक और दीर्घकालिक हो सकती है।
छोटे दलों को बचाने का मार्ग केवल बीजेपी-विरोध या कांग्रेस-विरोध नहीं है। उन्हें अपने भीतर लोकतंत्र लाना होगा। आंतरिक चुनाव, पारदर्शी वित्त, स्पष्ट सदस्यता-प्रणाली, सार्वजनिक उम्मीदवार चयन, वैचारिक प्रशिक्षण, स्थानीय नेतृत्व का सम्मान और परिवारवाद पर अंकुश, ये सब आवश्यक हैं। यदि टिकट वितरण में धन और निजी निष्ठा की जगह सेवा-इतिहास, जनविश्वास और नैतिक आचरण को महत्व मिले, तो दल-बदल की प्रवृत्ति स्वाभाविक रूप से घटेगी।
जनता की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। मतदाता यदि केवल जाति, क्रोध, तात्कालिक लाभ या करिश्माई नेता के आधार पर वोट देगा, तो उसे वैसी ही राजनीति मिलेगी। लोकतंत्र में दलों की गुणवत्ता नागरिक चेतना से अलग नहीं होती। सामान्य नागरिक जब यह अनुभव करता है कि नेता चुनाव के बाद उसके मत को निजी संपत्ति की तरह बेच सकता है, तो लोकतंत्र कमजोर होता है। इसलिए मतदाता को भी दल और उम्मीदवार से यह पूछना होगा कि उसकी निष्ठा किसके प्रति है: संविधान, समाज और विचार के प्रति, या केवल सत्ता और सुविधा के प्रति।
भारतीय राजनीति का वर्तमान क्षण छोटे दलों के लिए संकट भी है और अवसर भी। संकट इसलिए कि सत्ता से बाहर होते ही उनके भीतर बिखराव दिखाई दे रहा है। अवसर इसलिए कि वे यदि आत्मसुधार करें, तो वे भारतीय संघवाद, क्षेत्रीय आकांक्षाओं और सामाजिक प्रतिनिधित्व को स्वस्थ दिशा दे सकते हैं। क्षेत्रीय दलों की आवश्यकता समाप्त नहीं हुई है; परंतु उनकी पुरानी शैली, बंद नेतृत्व, टिकट-व्यापार, वंशवाद और वैचारिक अस्पष्टता अब टिकाऊ नहीं रही।
निष्कर्ष स्पष्ट है: छोटे दलों की शामत केवल इसलिए नहीं आयी कि कोई बड़ा दल शक्तिशाली हो गया। उनकी शामत इसलिए भी आयी क्योंकि उन्होंने अपनी दीवारें भीतर से कमजोर कर लीं। जो दल जनाधार को संगठन में, संगठन को विचार में, विचार को नीति में और नीति को नैतिक आचरण में नहीं बदलते, वे अंततः अपने ही सांसदों और विधायकों के विश्वासघात का शिकार बनते हैं। भारतीय लोकतंत्र को स्वस्थ रखने के लिए बड़े दलों पर मर्यादा और छोटे दलों पर आत्मसुधार, दोनों समान रूप से आवश्यक हैं।
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